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Mohan Geeta

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आज देश के हर वर्ग, हर समाज में भ्रष्टाचार, अत्याचार, अनाचार, व्यभिचार, हत्या, लूट–खसोट, घूसखोरी, जमा खोरी चोरी–डकैती, रक्त–शोषण आदि दुर्भावनाएँ चरम सीमा को छूने लगी है । आज का मानव अपने निकट अपने ही जैसे मानव को देखकर सशंकित, संदिग्ध और भयभीत होने लगता है । आज का मानव अपनी स्वार्थपूर्ति के लिए किसी की भी हत्या कर देता है, किसी का भी अधिकार छीन लेता है, किसी की भी रोटी छीन लेता है । शायद सोचता है कि इस धरती पर वह अकेला ही अमर होकर आया है । आज व्यक्ति स्वयं को चाहे जितना भी बड़ा ऐश्वर्यशाली, प्रतिभाशाली, शक्तिशाली, सर्वसम्पन्न, सर्वसमर्थ समझ रहा हो, किन्तु खेद के साथ कहना पड़ रहा है कि वह अपने आपको सुरक्षित नहीं समझ पा रहा है । आखिर क्यों ? मेरे समझ में इसका विशेष कारण धर्म और धर्मग्रन्थों की उपेक्षा, अज्ञान, स्वार्थपरता, आपसी वैमनस्य एवं साम्प्रदायिकता ही है । यह इसलिए कहना पड़ रहा है कि मनुष्य अपनी कृतघ्नता, लोलुपता ओर स्वार्थपरता के कारण ईश्वरीय धर्म के सांचे में स्वयं को नहीं ढाल पा रहा है । बल्कि धर्म को ही अपने सांचे में ढालने लगा है । स्वार्थ के कारण ही आज समाज में कई तरह के सम्प्रदाय, फिरके, मज’हब, पंथ और मत बनते चले जा रहे हैं । परिणामस्वरूप आज का इन्सान अपनी इन्सानियत से बहुत दूर भागता चला आ रहा हैं । जब कि यह सबको पता है कि धर्म या मज’हब हर दिलों को जोड़ने के लिए है, तोड़ने के लिए नहीं । देश में सभी धर्म सराहनीय हैं किन्तु हमारे देश में हिन्दू और मुसलमान अधिक हैं इसलिए मेरी तमन्ना है कि अगर सिर्फ यही दोनों समुदाय अपने महानतम ग्रन्थों का अध्ययन मनन और अनुपालन करें तो अपने आप हमारे देश की गरिमा–महिमा निरन्तर बढ़ती रहेगी, आपसी भाईचारा साम्प्रदायिक सद्भाव मानव सुरक्षा और राष्ट्रीय एकता के प्रति प्रगाढ़ता बनी रहेगी ।

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