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Manav Adhikar (Vedo Ke Aalok Mein)
मूल मन्त्र पित्रस्यां चक्षुषां सर्वाणि समीक्षे । मित्रस्यां चक्षुषा समीक्षामहे॥ यजुर्वेद-36/18 अर्थात्µहे अज्ञान रूपी अंधकार को दूर करने वाले प्रभु! जिस ज्ञान और व्यवहार से संसार के सारे लोग मुझे मित्र की दृष्टि से देखें और मैं भी सारे लोगों को मित्र की दृष्टि से ही देखूं । इसी तरह हम सभी लोग परस्पर एक दूसरे को मित्र की दृष्टि से देखें । उसी सद्भाव पूर्ण ज्ञान से हमें सदा मजबूत बनाए रखिए । डॉ– मोहम्मद हनीफ’ खान की संगति में मुझे भी कभी कभार पवित्र वेदों को उलटने–पलटने का अवसर मिल जाता है । वेद तो ज्ञान का भंडार हैय जिसका अर्जन कर पाना मेरे बूते की बात नहीं हैं किन्तु मेरे समझ से उक्त वेद मन्त्र–वेदों के सार स्वरूप है ओर संसार में सही और सुखमय जीवन जीने के लिए वही मूल मन्त्र हैं संसार के सभी धर्म ग्रन्थ यही उद्घोष करते आ रहे हैं कि इस सम्पूर्ण सृष्टि में मानव सर्वोत्तम प्राणी है । किन्तु क्या तू–तू, मैं–मैं, तेरा–मेरा ईर्ष्या–द्वेष, वैमनस्य चुगलखोरी, झूठ, स्वार्थ और भ्रष्ट तरीकों से किसी को अपमानित करना, किसी का धन दौलत छीन लेना तथा किसी के अधिकारों का हनन करना आदि घिनौने करतूतों से मुनष्य संसार का सर्वोेत्तम प्राणी कहलाने का दावा कर सकता है ? नहीं, बिल्कुल नहीं । मानव अपनी श्रेष्ठता को तभी कायम रख सकता हैय जब वह सारे लोगों का मित्र बनने का प्रयास करे और सारे लोग उसको भी मित्र समझें । इस मंच तक पहुँचने के लिए अपने मानवीय कर्तव्यों का निर्वाह आवश्यक है । वेद के साथ ही संसार के सारे धर्म ग्रन्थों में अपने अपने अधिकारों के लिए आंदोलन, उपद्रव, हड़ताल तोड़–फोड़ तथा दंगा–फ’साद करने की इजाजत नहीं हैय इसके लिए सर्वमत से यह उपदेश है कि हर मनुष्य जो जहाँ हैµहै बस निष्ठापूर्वक अपने कर्तव्यों का निर्वाह करते हुए अपनी गुणवत्ता प्रस्तुत करे तो अपने आप ही सब को अपना अपना अधिकार मिलता हुआ नज’र आएगा । मैं तो दावे के साथ यह कहना चाहूँगी कि यदि मनुष्य ईश्वर पर पूरा भरोसा कर के निष्ठापूर्वक अपने गुण और ज्ञान के अनुसार कर्तव्यों का निर्वाह करता रहेय तो उसके अधिकार निश्चित रूप से कदम चूमते रहेगें और नि%संदेह वह इस पुस्तक के मुख्य पृष्ठ तक पहुँच सकता है । प्रस्तुत पुस्तक इसी वैदिक उपदेश को चरितार्थ करने में सर्वथा समर्थ सिद्ध हो रही है । -कैसरबानो
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