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Rangmanch, Cinema Aur Telivision
हमारे जीवन में नाट्य शाश्वत है और वह अलग अलग रूपों में हमारे सामने प्रकट होता है । हम कभी उसे निजी जीवन के स्पंदन के रूप में लेते हैं तो कभी रचनात्मक अभिव्यक्ति के रूप में । संप्रेषण का सबसे सशक्त माध्यम होने साथ साथ नाट्य मनोरंजन का भी सबसे सशक्त माध्यम है । इसलिये नाटक ने जो भी रूप धरा उसे न सिर्फ पसंद किया गया बल्कि आत्मसात भी किया गया । रंगमंच में सभी कलाओं का समावेश है । इसलिये नाट्य शास्त्र को पाँचवाँ वेद भी कहा जाता है । नाटक को किसी भी स्वरूप में आत्मसात करना यानि अपने जीवन को और समृृद्ध करना है । नाट्य प्रदर्शन, नाट्य आलेख से लेकर किस्सागोई तक के पारंपरिक माध्यम हमारे जीवन को समृद्ध करते ही हैं । तकनीक के विकास के साथ साथ रंगमंच के और भी आयाम हमारे जीवन में जुड़ते चले गये हैं । ‘रंगमंच, सिनेमा और टेलीविजन’ नाट्य के ऐसे ही अलग अलग रूपों का प्रस्तुतीकरण है । जब कोई व्यक्ति जो इन तीनों विधाओं से न सिर्फ गुजरा हो बल्कि जिसका इन तीनों विधाओं में समान अधिकार हो तो उनके द्वारा रची कृति सिर्फ संस्मरणों का खजाना बन कर नहीं रह जाती है, बल्कि एक अमूल्य बौद्धिक संपदा भी बन जाती है । श्री राजेन्द्र उपाध्याय द्वारा लिखी यह पुस्तक किसी भी तरह के अध्ययन के लिए एक बहुमूल्य बौद्धिक संपदा है जो बहुत ही मनोरंजक तरीके से प्रस्तुत की गई है । इसमें रंगमंच की जीवन्तता है, सिनेमा का चमत्कार है और टेलीविजन का स्थायित्व भी है । डॉ– सच्चिदानंद जोशी
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