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Hindi Rangmanch: Samkalin Vimarsh
नाटक देखकर, मंच से जुडकर और रंगकर्म को समग्रता में समझकर लिखने वाले हिन्दी में जो बहुत थोड़े से लोग हैं, उन्हीं में एक काफी चर्चित नाम है – सत्यदेव त्रिपाठी । वैसे तो पूरे हिन्दी समीक्षा–जगत में सत्यदेव त्रिपाठी एक सुपरिचित नाम है । विविध विषयों पर उनकी दर्जन भर पुस्तकें हिन्दी में समादृत हैं । परंतु देश की प्राय: सभी प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में पिछले 25 वर्षों से थियेटर सम्बन्धी बेबाक’ लेखन से एक जीवंत उपस्थिति दर्ज़ कराने वाले त्रिपाठीजी के इस विषय पर पुस्तकाकार कार्य की प्रतीक्षा अब पूरी हो रही है । इसके पहले भारी–भरकम, पर कलात्मक ढंग से छपी उनकी पुस्तक ‘तीसरी आँख का सच’ (प्रमुख रंग–समीक्षाओं का संकलन) ही आयी है । इस प्रकार रंगमंच से उनके लम्बे जुड़ाव के साक्षात अनुभवों एवं गहन चिंतन से संवलित यह पहला कार्य ‘हिन्दी रंगमंच : समकालीन विमर्श’ अब आपके सामने है । उल्लेख्य है कि उनका इसी तरह का काम ‘हिन्दी उपन्यास : समकालीन विमर्श’ 10–12 सालों पहले ही आकर पर्याप्त चर्चित हो चुका है । अब उसी प्रक्रिया में समकालीन रंगकर्म के जीवंत सन्दर्भों व सरोकारों से जुडकर परखने और उसमें कालातीत की सम्भावनाओं को तलाशने की श्री त्रिपाठी की अध्ययन–वृत्ति का यह एक और प्रखर सबूत सिद्ध होगा । इसमें मौजूदा समय की प्रमुख चुनौतियों से रंगकर्म की समक्षता का तो सप्रमाण आकलन हुआ ही है, रंगमंच की अपनी अन्दरूनी चुनौतियों को भी उतनी साफ्गोई से उभारा गया है । जिस तरह पुस्तक के कटेंट के ये दो आयाम हैं, उसी तरह इसकी परख और परीक्षा भी यथोचित रूप से कहीं ‘वज्रादपि कठोराणि’ हो गयी है, तो कहीं ‘मृदूनि कुसुमादपि’ बन पडी है । परंतु जो भी है, सटीक व सबल प्रमाणों से पुष्ट है–––और यही डॉ त्रिपाठी की ताक़त है । विवेचन में रोचकता है, परंतु निष्कर्षों में विषयानुसार पर्याप्त ख़लल भी । यह रंजित भी करता है और उद्वेलित भी । इस अध्ययन की यह ख़ासियत नाट्यानुकूल भी है । पूरी पुस्तक से एक बार गुज़र जायें, तो पिछले ढाई दशक के रंगकर्म व इससे जुडे ज्वलंत मुद्दों से साक्षात्कार का–सा सुखद व आश्वस्तकर अनुभव होता है, जिसके लिए यह पुस्तक साहित्य व कलाप्रेमियों के लिए तो अनिवार्य रूप से पठनीय है ही, आम पाठक को पढने के लिए भी वांच्छनीय है । और थियेटर आर्ट के प्रति अपने सोच व अन्वेषण को व्यक्त करने की त्रिपाठीजी की अपनी एक स्टाइल है, जिसे परखना किसी शास्त्रज्ञ के लिए अतिरिक्त उपयोगी व विनोद–प्रियता का सबब होगा–––
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