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Santosh Chubey Sanchyita (2 Vol.)
संतोष चैबे मानवीय भावनाओं के अप्रतिम चितेरे हैं । उन्होंने अपने कथा–साहित्य में मानवीय संवेदना और सम्बन्धगत भावनाओं की बड़े ही बारीक और महीन ढंग से पुनर्रचना की है । सतही फ़तवेबाजी और बड़बोलापन कभी उनकी रचनाओं में देखने को नहीं मिलता, न ही कोई वर्जित प्रसंग या भदेस चीजों का समाहार । हाँ, समय की कैमिस्ट्री और क्लाइमेट, रचना और स्थितियों की वास्तविक जानकारी वहाँ जरूर होती हैं; सामाजिक परिपार्श्व में वस्तुस्थिति की उनकी गहरी पकड़ और तद्जन्य मानसिक संवेदनाओं का ,ऐसा अंकन कि मानो किसी भी मत या वर्ग के पाठक को तत्कालीन युग को समझने का उससे सच्चा और अच्छा माध्यम ही न मिले । कथाकार और उपन्यासकार के रूप में संतोष जी की लेखनी ने स्तरीयता और लोकप्रियता की खाई को पाटते हुए एक नई जमीन बनाई, जहाँ हर वर्ग और हर रुचि के पाठक सहज भाव से विचरण कर सकते हैं । उनका रचनाकार मन उन सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक स्थितियों को अनदेखा नहीं करता, वरन् उसका वास्तविक चित्रण कर उसका सामना करने के लिए प्रोत्साहित करता है । सुखद संयोग है कि संतोष चैबे ,क सहृदय कवि भी हैं । दरअसल सामाजिक, पारिवारिक, शैक्षणिक जीवन में आपादमस्तक डूबे संतोष चैबे जैसे किसी सहृदय के लि, बार–बार प्रकृति में सुकून के क्षण तलाश कर उससे संवाद करना स्वाभाविक है । उनकी कविताएं ‘कालजयी कविता’ की भाँति हमें कुछ–न–कुछ नया जरूर देती हैं, जहाँ एक ओर वे हमारे अन्तर्मन के सौन्दर्यबोध को जगाती हैं, वहीं दूसरी ओर हमारी संवेदना को झकझोर कर बहुत कुछ जोड़ती चलती हैं । उनकी सहज, सरल शब्द–सम्पदा हमें ऐसे अनेकानेक दृश्यों–परिस्थितियों से परिचित कराती है, जहाँ से हम अपने जीवन को एक नया अर्थ देने के साथ–साथ उसे ,क बृहत्तर सन्दर्भ में समझ पाते हैं, साथ–ही–साथ हम सृष्टि और प्रकृति के बहुतेरे मर्मों को भी पहचान पाते हैं । –‘पुरोवाक्’ से
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