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P. N. Singh Rachnawali
प्रस्तुत रचनावली में शामिल लेख हिन्दी आलोचना की उस जिम्मेदारी के प्रमाण हैं जो हिंदी जनपद में नवजागरण की प्रक्रिया और अनिवार्यता को सिर्फ़ इतिहास तक सीमित नहीं मानती । हिंदी आलोचना का एक नया मुहावरा ही नहीं, नयी शब्दावली ही नहीं एक नयी चिंतन प्रक्रिया और व्यापक जिम्मेदारी का भाव जो पी–एन– सिंह को सबसे अलग करता है वह इस रचनावली में मौजूद है । हिंदी आलोचना को एक राजनीतिक, सांस्कृतिक और सामाजिक दायित्त्व मानते हुए जिस सहजता से वे अपनी तरफ़ आकृष्ट करते हैं वह भी इस बात का प्रमाण है कि कठिन होना नहीं, सहज होना ही ज्ञान और साधना की उपलब्धि है । विचार की दुनिया भाषा, भूगोल और इतिहास का अतिक्रमण करती है । हिंदी का वैचारिक संसार भी अपवाद नहीं – पी –एन –सिंह का विवेकानन्द, रविंद्रनाथ, गाँधी, भगत सिंह, अम्बेडकर, नरेन्द्र देव, वाल्तेयर, मार्क्स, कॉडवेल आदि पर उपलब्ध लेखन उनकी बहुआयामी चेतना और विषद अध्ययन का सुफल तो है ही , उसके साथ–साथ हिंदी की वैचारिक विरासत से वह वास्तविक साक्षात्कार भी है जो न तो अपनी आत्ममुग्धता की ग्रंथि से पीड़ित है, न ही एक के खिलाफ़ दूसरे को खड़ा करने की सपाट और सतही समझ का शिकार है । विचारधारा को वे जिस इतिहासबोध से जोड़कर देखते हैं वह उन्हें यह समझ देती है कि एक के खिलाफ दूसरे को खड़ा करने से राजनीतिक मंच पर नारा लगाने में सुविधा हो सकती है, अकादमिक जगत में इसके भयानक दुष्परिणाम और दुर्घटनाएँ संभव हैं । देश की सामाजिक और राजनीतिक उथल–पुथल ही नहीं, हिंदी साहित्य के कलात्मक उत्कर्ष पर भी पी–एन– सिंह की नज़र है । यशपाल, निर्मल वर्मा, शिवप्रसाद सिंह, कुबेरनाथ राय, राही मासूम रजा, विवेकी राय, दूधनाथ सिंह, धर्मवीर भारती, केदारनाथ सिंह, गिरिराज किशोर आदि की रचनाओं पर विचार करते हुए उन्हें यह स्वीकार करने में कोई संकोच नहीं है कि रचना के लिए केवल वैचारिक पक्षधरता ही पर्याप्त नहीं होती बल्कि कलात्मक उत्कृष्टता अनिवार्य होती है । रचनाओं पर चिंतन के साथ–साथ पी–एन–सिंह का मूल्यांकन परक दृष्टिकोण समूची भारतीय परम्परा के समस्त आंतरिक और बाह्य अंतर्विरोधों को पाठक वर्ग के समक्ष प्रस्तुत करता है । अपने लेखों में वे हिंदी जनपद के मार्गदर्शक की भूमिका में भी दिखाई देते हैं जहाँ वे परम्परा के आधुनिक व्याख्याकारों के मतों को स्पष्ट करते हुए हर बुद्धिधर्मी से एक सार्थक हस्तक्षेप की उम्मीद करते हैं । वे इतिहास, दर्शन, सामाजिक–सांस्कृतिक आंदोलन, आर्थिक विषमता, वैश्विक चुनौतियां, राष्ट्रीय पुनर्निर्माण आदि विषयों पर स्वतंत्र रूप से चिंतन करते हुए अपने समग्र जीवन–बोध का परिचय देते हैं । वह जीवन बोध जो किसी ‘आर्गेनिक इंटेलेक्चुअल’ द्वारा ही संभव है । प्रस्तुत रचनावली में सम्मिलित लेख अनेक विषयों पर चिंतन–मनन करने का अवसर प्रदान करते हैं । उनकी इस चिंतन–यात्रा में महात्मा बुद्ध और कबीर भी अपने सपनों के साथ शामिल हैं । वे सपने जो एक नया देश देखना चाहते थे । कबीर के अनुयायियों को टैगोर ने ‘भारतपंथी’ की संज्ञा दी है । भारत की इतिहास धारा को सबसे अधिक प्रभावित करने वाले इन दोनों व्यक्तित्त्वों के महत्त्व को गुरुदेव रविन्द्रनाथ ठाकुर ने रेखांकित किया था । पी–एन– सिंह का भारत–बोध इसी चेतना का विकास और विस्तार है ।
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