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Gandhi, Lohiya , Jaiprakash Aur Humara Samay

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आनन्द कुमार मानते हैं कि गाँधी के जाने के बाद की दुनिया में भोगवाद, युद्ध और हिंसा का विस्तार हुआ है लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि गाँधी का महत्त्व कम हुआ है । दक्षिण अफ्रीका के रंगभेद–विरोधी आन्दोलन से लेकर यूरोप के पर्यावरण आन्दोलन और ब्राजील के निर्धनता निवारण प्रयासों से लेकर भारत की ग्रामीण गारंटी योजना और महिला सशक्तीकरण योजना, सब में जिस तरह से गाँधी की गूँज सुनाई पड़ती है वह गाँधी की बढ़ती प्रासंगिकता को ही रेखांकित करती है । आज की विषम परिस्थितियों के सन्दर्भ में गाँधी मार्ग कैसे कारगर हो सकता है, इस पर लेखक ने अपनी महत्त्वपूर्ण स्थापना दी है । ऐसे कठिन समय में जब पूँजीवादी भूमण्डलीकरण के दुष्परिणाम सामने आने लगे हैं, लोकतन्त्र खास्ताहाल में है, तब आनन्द कुमार के ये प्रस्ताव कि ‘सहकारिता के बगैर सर्वोदय समाज की रचना असम्भव है’, ‘प्रभुजाति प्रजातन्त्र से सहभागी लोकतन्त्र की ओर’, ‘बेहतर राजनीति–समस्या का समाधान’ बहुत मायने रखते हैं । आज जबकि साम्प्रदायिक शक्तियों और व्यापारिक घरानों का गठजोड़ लोकतन्त्र को तबाह कर रहा है, हिंसा, गैरबराबरी और भ्रष्टाचार ने सामाजिक ताने बाने को तार तार कर दिया है, एक ऐसा विद्वान शिक्षक जो ईमानदार जनसेवक भी है, की यह पुस्तक एक राहत के रूप में सामने आयी है । इन लेखों में एक वरिष्ठ समाजशास्त्री की राजनीतिक चिन्ता जरूर व्यक्त हुई है, लेकिन पाठकों पर उसका असर चिन्ताजनक नहीं है । अपने समय की सामाजिक विडम्बनाओं से रचनात्मक मुठभेड़ करते हुए ये लेख अपनी वैचारिक ऊष्मा से पाठकों को राजनीतिक उपचार मुहैया कराते हैं । पिछले 20 वर्षों से विचार पर बाजार का हमला इतना तेज रहा कि विचार प्राय: सकुचाते हुए रक्षात्मक मुद्रा में रहा है । इस पुस्तक के लेखों को पढ़ते हुए पहली बार यह लग रहा है कि बाजार पर विचार का यह पलटवार है ।

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