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Bhartiya Musalman : Mithak, Itihas Aur Yatharth

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हिन्दू–मुस्लिम साम्प्रदायिकता के राजनीतिक परिप्रेक्ष्य और परिणति की पड़ताल इस अध्ययन का एक महवपूर्ण पहलू है और इसे उचित ही धर्म की तार्किक परिणति न मानकर राजनीति की विकृति के रूप में पेश किया गया है । स्वाधीनता पूर्व से लेकर बाद तक के घटनाक्रमों के हवाले से भारतीय जनमानस को व्यापक रूप से मूलत% गैर–साम्प्रदायिक मानते हुए साम्प्रदायिक राजनीति के वास्तविक चरित्र की पड़ताल की कोशिश भी यहाँ मौजूद है । अच्छा है कि यह सब कुछ इतिहास के साक्ष्यों, ऐतिहासिक व्यक्तित्वों की भूमिका और देश– विभाजन से जुड़े घटनाक्रमों में रच–बसकर प्रस्तुत हुआ है । लेकिन भारतीय राष्ट्रवाद की कसौटी पर मुस्लिम अस्मिता को जिस तरह आजाद भारत में लहूलुहान किया जाता रहा है और जिस तरह धर्मनिरपेक्षता को एक सुविधाजनक मुखौटे के रूप में धारण किया जाता रहा है उसे भी इस अध्ययन में आलोचनात्मक बनाया गया है । इस सन्दर्भ में उचित ही राही मासूम रजा और शानी के हवाले से मुस्लिम अस्मिता को भारतीय अस्मिता का अंग मानते हुए उन ‘राष्ट्रवादियों’ को प्रश्नांकित किया गया है जो अपनी संकीर्ण साम्प्रदायिक दृष्टि के चलते धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र की अवधारणा को सीमित करते हैं । यह सचमुच विडंबनात्मक है कि अपनी बहुसंख्यक धार्मिक पहचान के चलते उग्र हिन्दुत्ववादियों का समूह एक समूची अल्पसंख्यक जमात की देशभक्ति और भारतीय नागरिकता को प्रश्नांकित करने का दुस्साहस करता है ।

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