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Vishwavidhyala Parisar Jeevan Aur Hindi Upanyas
डी. एच. लारेन्स ने उपन्यास को जिन्दगी की एक चमकती हुई किताब-‘‘द वन ब्राइट बुक आफ लाइफ’’-कहा है । वह आगे लिखता है : ‘‘पुस्तकें जिन्दगी नहीं होतीं । वे केवल शून्य में थरथराहट होती हैं । पर थरथराहट के रूप में उपन्यास सम्पूर्ण जीवित मानव को कम्पित कर सकता है : कविता, दर्शन, विज्ञान या किसी भी अन्य पुस्तक की थरथराहट इतना नहीं कर सकती है ।’’1 वस्तुत: जीवन की हल्की–से–हल्की थरथराहट को भी उपन्यास, भूकम्प प्रलेख यन्त्र की तरह अंकित कर लेता है । जिन्दगी में जो कुछ भी घटित होता है, वह चाहे कविता या नाटक अथवा अन्य किसी साहित्य–विद्या की पकड़ से बच जाये, पर उपन्यास से बच निकलना उसके लिए सम्भव नहीं है । परिसर–जीवन की वास्तविकता आज शिक्षाशास्त्रियों के लिए एक सरदर्द बनी हुई है । अनेक विद्वानों ने विश्वविद्यालयों में सभी स्तरों पर व्याप्त अनुशासनहीनता, मूल्यगत ह्रास, भ्रष्टाचार आदि पर चिन्तन–मनन किया है, पर संवेदनात्मक स्तर पर इस यथार्थ से साक्षात्कार उपन्यास ने ही किया है । हिन्दी उपन्यास इस दृष्टि से परिसर–जीवन की हल्की–सी धड़कन से लेकर उसकी हड़कम्प–भरी वास्तविकता का प्रलेख–यन्त्र कहा जा सकता है । जिस जमाने में परिसर–जीवन पूर्णत: अनुशासित था, केवल बेरोजगारी का प्रश्न ही हल्के असन्तोष का कारण था, उस काल के हिन्दी उपन्यासों में भी इस असन्तोष की फुसफुसाहट सुनाई पड़ती है । जैसे–जैसे परिसर–जीवन की हलचलें तेज होती गयीं, वैसे–वैसे हिन्दी उपन्यास में भी उनकी ध्वनि स्पष्ट होती गयी है । सातवें दशक में भारतीय परिसर–जीवन में अचानक एक भूचाल–सा आ जाता है और इस दशक के समाप्त होते–होते हिन्दी उपन्यास में भी इसकी गड़गड़ाहट सुनाई देने लगती है । आठवें दशक से आरम्भ होकर आज तक हिन्दी उपन्यास परिसर–जीवन में नग्न यथार्थ का चित्र प्रस्तुत करता रहा है ।
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