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Upanyas Kala Aur Siddhant (2vol)

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उन्नीसवीं शताब्दी में उपन्यास के नाम पर जो कुछ हमारे यहाँ आया उसमें आप को दास्तान, किस्सागोई, आख्यानक और कथात्मकता आदि ये सारी चीजें मिलेंगी । हो सकता है ये रोमांस की कोटि में आ जाएँ, लेकिन ठेठ पारिभाषिक अर्थ में ये नावेल बनते हुये दिखाई नहीं देते । इसी अर्थ में मैंने कहा कि भारत में उपन्यास का उदय मध्यवर्ग के महाकाव्य के रूप में नहीं हुआ । क्योंकि भारत में मध्यवर्ग इस लायक नहीं था कि उन्नीसवीं शताब्दी में किसी नयी रूप–विधा को जन्म दे सके और अपनी संस्कृति का विकास कर सके । -नामवर सिंह

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