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Swami Sahjanand Aur Unka Kisan Andolan
स्वामी सहजानन्द सरस्वती.... एक दंडी संन्यासी जिसने किसान को भगवान मानकर सारा जीवन किसानों के जागरण, संगठन और आन्दोलन को समर्पित कर दिया.... जिसने बेधड़क ऐलान किया रोटी भगवान से बड़ी है..... जिसने "वंदे मातरम्" की तरह "वंदे अन्नदातरम्" का नारा दिया, जिसने 1929 में बिहार प्रदेश किसान सभा की नींव डाली, जमींदारी उन्मूलन की आवाज उठायी और बकाश्त आन्दोलन का ऐसा संग्राम छेड़ा जिसमें सदियों के सोए किसान इतिहास के नायक बनकर उभरे और उन्होंने बड़हिया, रेवड़ा, मँझगाँवा, अमवारी, छितौली और साँड़ा में भारतीय किसान आन्दोलन की शानदार मिसालें कायम कीं... 1936 में गठित अखिल भारतीय किसान सभा के अध्यक्ष इस अनोखे किसान नेता ने न केवल स्वाधीनता संग्राम के दौरान किसान हितों की पताका बुलन्द रखी बल्कि आजादी के तुरन्त बाद "मजदूर किसान राज्य" का कार्यक्रम प्रस्तुत किया और इसके लिए 18 वामपंथी दलों के संयुक्त मोर्चे की पहल की.... यह पुस्तक भारत में संगठित किसान आन्दोलन के उसी अग्रणी नायक के जीवन, विचार और कर्म का प्रभावशाली रेखाचित्र प्रस्तुत करती है जिसमें एक ओर स्वयं स्वामी सहजानन्द की जीवन गाथा है तो दूसरी ओर उनके आन्दोलन के जुझारू नायकों की संस्मरण गाथा भी है, एक ओर विभिन्न किसान संघर्षों के जीवन्त आख्यान हैं तो दूसरी ओर सुदूर देहातों में सहजानन्द के बीहड़ दौरों के रोमांचक बयान हैं। डॉ. अवधेश प्रधान की यह पुस्तक स्वामी सहजानन्द और उनके किसान आन्दोलन का इतिहास, आख्यान और विश्लेषण ऐसी सरल-सुबोध शैली में प्रस्तुत करती है कि यह किसान आन्दोलन के नेताओं से लेकर कार्यकर्ताओं तक को, शोध जिज्ञासुओं से लेकर सामान्य पाठकों तक को रुचिकर और उपादेय होगी।
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