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Sukesh Sahani: Pratinidhi Lagukathyen
समकालीन हिन्दी लघुकथा–लेखन से जुड़कर सुकेश साहनी की रचनाधर्मिता अपने समय, सच एवं परिवेश से सीधा साक्षात्कार करती है तथा समस्त विसंगतियों एवं दलित–पीड़ित मानसिकता से लोहा लेती हुई एक ऐसे मार्ग का संधान करती है, जहाँ मानवोत्थान एवं मानवीय संवेदना की भावना होती है । वास्तव में उनकी सृजनधर्मिता आज की अराजक भीड़ में खोए एक ऐसे आदमी की तलाश है, जो सहज, स्निग्घ, ॠजु एवं छद्ममुक्त हो जाने की कोशिश में हर बार रीतता रहा है और क्षरित होकर भी नव सर्जन की आशा में आस्था का सूत्र कभी छोड़ना नहीं चाहता । अपने बहुआयामी रचना–संसार में सुकेश साहनी बारी–बारी सभी दिशाओं की परतों को खोलता है, विश्लेषित करता है और सार की वस्तु को न पाकर आगे बढ़ जाता है–––उसे हर कहीं तलाश होती है मनुष्य की गरिमा को अपनी सम्पूर्णता में प्रतिष्ठित करने वाली उस लुकाठी की, जो नाना झंझावातों में भी प्रज्वलित हो मनुष्यता का मार्ग प्रशस्त करती रहती है । उनकी प्राय% सभी लघुकथाओं में इसी लुकाठी की ऊष्मा होती है, जिसकी आँच पाठक भी महसूस करते है और अपने को उनकी रचनाओं में विलीन पाते हैं । सुकेश साहनी की रचनाधार्मिता की कदाचित् यही शक्ति उसे अपने समकालीनों से अलग करती है । उनकी शक्ति रचना की शक्ति है, जो मनुष्य को उसके छद्म में नहीं, मनुष्यता में मापती–सँवारती है । डॉ– शिवनारायण
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