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Striyon Ki Sthiti

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मदर इंडिया का जवाब के बाद अपनी अगली कृति ‘स्त्रियों की स्थिति’ में लेखिका चन्द्रावती लखनपाल के ‘प्रारम्भिक शब्द’ हैं, “मैं अपनी पश्चिमी बहनों की तरह आजादी तो चाहती हूँ, और बड़े जोर से चाहती हूँ, परन्तु मुझे पश्चिमी आदर्शों से प्रेम नहीं है । हमें आजादी की भावना उनसे सीखनी होगी, परन्तु आदर्श अपने रखने होंगे । मैं चाहती हूँ कि सिर्फ पूर्व अथवा सिर्फ पश्चिम के पीछे भागने के बजाय दोनों में जो सत्य है, शिव है, सुन्दर है, उसका सम्मिश्रण करके स्त्रियों की स्थिति की कल्पना की जाय ।”37 आज जब हिन्दी में स्त्री–विमर्श एक भटकाव के दौर से गुजर रहा है, ये पक्तियां दिशा–निर्देश का काम कर सकती हैं । आज के लिए यह भी जरूरी है हम अपने औपनिवेशिक अतीत की सुनी–अनसुनी आवाजों को, उसकी चुप्पियों को, उसके उद्घोषों को फिर से सुनने का यत्न करेंµकहीं ऐसा तो नहीं कि बंगाल–केन्द्रित नवजागरण के महाख्यान में जिसे ‘अप्रासंगिक’ समझकर हम आगे बढ़ चुके थे, वे आज न सिर्फ प्रासंगिक हों बल्कि अग्रगामी भी जान पड़ें । हिन्दी क्षेत्र के सांस्कृतिक इतिहास से परिचय प्राप्त करने के लिए इस क्षेत्र के स्त्री संघर्ष का इतिहास जानना जरूरी है और स्त्री संघर्ष के इतिहास को जानने के लिए इस संघर्ष से उत्पन्न कृतियों को पढ़ना जरूरी है । हिन्दी नवजागरण और स्त्री साहित्य श्रृंखला के अंतर्गत ऐसी ही पुस्तकों को पुनर्प्रकाशित करने की योजना है, जो या तो वर्षों से अप्राप्य हैं या जिन पर हिन्दी के सुधी–जनों का ध्यान बहुत कम गया है । आशा है, इन पुस्तकों के माध्यम से हिन्दी नवजागरण और हिन्दी स्त्री–लेखन पर एक नई दृष्टि से सोचने–समझने का सिलसिला शुरू होगा । ---भूमिका से

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