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Srajan Ka Pratipaksh
एक रचनाकार के पास प्राथमिक आवश्यकता उसका भाव-संवेदन और भाषा-संवेदन है। इन दोनों का संयुक्तिकरण वे कल्पना के माध्यम से रचना में प्रयुक्त करता है। आलोचना भाषा, भाव और कल्पना तीनों को विषय के साथ सम्बद्ध कर उसकी वस्तुनिष्ठ परख करती है। इसलिए आलोचक का प्रथम कर्तव्य है रचना में अन्तर्निहित शक्तियों को अनावृत्त या उद्घाटित करे। साथ ही उन तत्त्वों को भी प्रकाशित करे जो रचना को संपुष्ट करने में बाधक हैं। आलोचक की दृष्टि बाह्य दृष्टि न होकर गहन दृष्टि होनी चाहिए जिससे वो रचना के वस्तु-शिल्प का उत्खनन करता है और रचना को अपने पाठ से पाठक के पाठ तक पहुँचाने में मदद करता है। इस क्रम में रमेश दवे जी के आलोचना-कर्म की पहचान की जा सकती है। कवि-कथाकार रमेश दवे एक स्थितप्रज्ञ आलोचक हैं। वादों-विवादों, खेमेबाजी, नारेबाजी और विचारधारागत पूर्वाग्रहों, पुरस्कार-सम्मानों की आकांक्षा से हमेशा दूर रहते आ रहे दवे जी की लेखनी पिछले चार दशकों से निरन्तर गतियमान रही है। सच तो यह है कि लेखन ही उनका जीवन है और जीवन ही उनका लेखन। वे जब नहीं लिख रहे होते हैं तब भी उनका लेखन उनके मानस पटल पर चलता ही रहता है। दवे जी कविता के रास्ते कथा-साहित्य की ओर मुड़ते हैं और कथा-साहित्य से होते हुए आलोचना की ओर लौटते हैं। रमेश दवे अपने लिए लेखक हैं; अपने किये लेखक हैं; वे अपने चाहने से लेखक हैं। उनकी कलम मूल्यों के लिए लिखती है, मूल्यों के दावेदारों के लिए नहीं।µ इसी में ‘सृजन का प्रतिपक्ष’ की महत्ता निहित है। -‘पुरोवाक्’ से
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