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Shiksha : bhara pura akaal
हाल के वर्षों में शिक्षा के क्षेत्र में खड़ी की गयी बहसें खासकर भाषा के तौर पर संस्कृत की अनिवार्यता, पाठ्यक्रम की किताब में कार्टून को शामिल किये जाने पर उठ खड़े हुए विवादों को इस पुस्तक में बेहतरीन तरीके से समेटा गया है । मोंटेसरी शिक्षा पद्धति को लेकर आज भी हमारे मन में बहुत भ्रम की स्थिति बनी हुई है । उम्मीद है कि क्रांतिकारी लेखक गिजुभाई बधेका के लेख से भ्रम का यह धुन्धलका कुछ हद तक जरूर छंटेगा । शिक्षा के बाजारीकरण से उठ खड़ी हुई समस्या को ध्यान में रखते हुए शिक्षाविद् अनिल सद्गोपाल ने राजनेताओं की पोली संवेदना का जिक्र अपने लेख में किया है । शिक्षा के समाजशास्त्रीय और दर्शनशास्त्रीय पहलुओं पर बहुत विस्तार से बात की गयी है । प्रसिद्ध पर्यावरणविद अनुपम मिश्र यों तो पानी के विशेषज्ञ के तौर पर दुनिया भर में जाने जाते हैं लेकिन वे शिक्षा पर भी इतनी गहरी समझ रखते हैं, ऐसा इस पुस्तक में शामिल उनका लेख “कितना सर्जन, कितना विसर्जन” को पढ़ते हुए लगेगा । आम तौर पर स्कूलों में पाठ्î–पुस्तकों की कमी को लेकर हर साल की शुरूआत में शिक्षक, छात्र, अभिभावक और स्कूल प्रशासन बहुत दबाव महसूस करता है । शिक्षाशास्त्री कृष्ण कुमार सुझाते हैं– “हर साल किताब के लिए नये सिरे से प्रबन्धन करने से अच्छा तो यह होता कि अभिभावकों की बजाय स्कूल प्रशासन किताबों की खरीद करता । इससे हर साल कुछ पेड़ों को कटने से भी बचाया जा सकता ।”
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