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Shantiniketan

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मुंशी नवजादिकलाल का ‘शान्ति निकेतन’ जब प्रकाशित हुआ प्रेमचंद के ‘सेवा–सदन’ और ‘प्रेमाश्रम’ छप चुके थे और ‘रंगभूमि’ लिखा जा रहा था जो उसके अगले वर्ष 1925 में प्रकाशित हुआ । उसका सम्पादन और भाषिक परिष्कार बाबू शिवपूजन सहाय ने ही किया था जो तब पण्डित दुलारे लाल भार्गव के प्रेस में कार्यरत थे । प्रेमचन्द के इन उल्लिखित उपन्यासों की तरह ‘शान्तिनिकेतन’ की पात्र योजना भले ही वैसी जीवन्त और स्मरणीय न हो, लेकिन, उसका एक उल्लेखनीय पात्र बेशक उसकी सहज–स्वाभाविक और विश्वसनीय चरित्र सृष्टि में ही निहित है । इस सन्दर्भ में नव जागरणकालीन आरम्भिक उपन्यासों ‘परीक्षागुरु’, ‘भाग्यवती’, ‘सौ अजान एक सुजान’ आदि से उसमें एक स्पष्ट अन्तर लक्षित किया जा सकता है । अपनी चरित्र सृष्टि में ‘शान्ति निकेतन’ भुवनेश्वर मिश्र के ‘बलवन्त भूमिहार’ और ‘घराऊ घटना’ जैसे उपन्यासों के अधिक निकट पड़ता है । उपन्यास का एक उल्लेखनीय पक्ष यह भी है कि भारतीय एवं पश्चिमी सभ्याताओं के प्रतीक पात्रों के युग्म बनाकर पश्चिमी सभ्यता का एक विश्वसनीय धारावाहिक क्रिटीक तैयार किया गया है जो पश्चिमी सभ्यता की आलोचना से अधिक भारतीय सभ्यता के सकारात्मक पक्षों पर अधिक आधारित है ।

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