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Shankar Puntambekar Ka Vyangya Sahitya

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समाज के लिए हानिकारकए आपत्तिजनक प्रवृत्तियाँए विचारधाराएँ व्यंग्य का लक्ष्य होती हैं । इस दृष्टि से स्वस्थए सुन्दर और भव्यतर जीवन निर्माण का वह एक साधन है । इसी साधन से डॉ– पुणतांबेकर की साधना अखण्ड रूप से जारी है । उनका परसाई स्कूल की ओर का रुझान उन्हें अन्य समकालीन व्यंग्यकारों से अलगाता है । उनकी रचनाओं में स्थित बौद्धिकताए गंभीरता की प्रधानता उन पर परसाई के प्रभाव को परिलक्षित करती हैं । परसाई उनके आदर्श रहे हैंए परंतु उन्होंने केवल उनका अनुकरण नहीं किया है तो चुस्त और विदग्ध कथ्य के प्रयोग से एक छोटी रचना में भी विसंगतियों के वैविध्य को साध कर अपनी अलग पहचान बनायी है । उनकी विविधांगी रचनाओं को देखते हुए एहसास होता है कि उनके साहित्य की समीक्षा के लिए व्यंग्य के नये–नये प्रतिमानों की आवश्यकता है । पुणतांबेकर केवल व्यंग्यकार ही नहीं तो व्यंग्य समीक्षक भी हैं । अपने तर्क संगत विचारों को उदाहरणों के साथ समझाकर उन्होंने व्यंग्य के विधापन पर बड़े आत्मविश्वास के साथ मुहर लगायी है । उनकी कुछ रचनाएँ दुरूह जरूर हैंए परंतु दुरूहता के बावजूद एक बार उनकी तलब लगने पर दूसरा कुछ भाता भी नहीं है । अत: मैंने पुणतांबेकर जी के साहित्य पर शोध करना अपना परम सौभग्य समझा है । उनमें स्थित निर्भयताए संघर्षशीलताए कर्मठता और दृढ़ता को देखते हुए उन्हें हजारीप्रसाद द्विवेदी जी के ‘कुटज’ की उपमा देना अतिशयोक्तिपूर्ण नहीं होगा । समकालीन हिन्दी व्यंग्य लेखन में यही उनका स्थान है । -इसी पुस्तक से

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