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Samkalin Aalochna Ke Antarvirodh
''प्रगतिवादी आन्दोलन यदि बहुत-कुछ पीछे हटा है तो इसका एक कारण यह भी है कि प्रगतिवादी प्रवक्ताओं ने अपनी वही पुरानी छर्रेवाली बन्दूक और वही पुराने तमंचे निकाले जिनकी आज कोई कीमत नहीं । संक्षेप में, उनके पास, प्रगतिवादी प्रवक्ताओं के पास, मध्यवर्गीय अन्ध-सिद्धान्तवादी अहंकार तो था, किन्तु कला की सृजनशील प्रक्रिया में, कला-सम्बन्धी समस्याओं में, वह सूक्ष्म गति नहीं थी, जो कि एक जीवन-मर्मज्ञ और कला-मर्मज्ञ के लिये आवश्यक होती है । यही नहीं, लेखकों से विशेषकर नये ढंग के लेखकों से वे तनकर अलग रहते थे । सिद्धान्तों के आइवरी टावर में रहकर वहाँ के बुर्जों से वे लेखकों के नयेपन पर, और नये लेखकों के यूथ पर, अपने तीर-कमान का प्रयोग करते थे, खूँखार होकर । ---सच तो यह है कि वे घिसे-पिटे थे और अपने घिसे-पिटेपन को सिद्धान्तवादिता का जामा पहनाकर सर्वमान्य होने का प्रयत्न करते थे । यहाँ उनकी आलोचना करने का मेरा अभिप्राय नहीं है । मैं तो यह कह रहा हूँ कि प्रगतिवादी धारा का जो पीछे हटना हुआ, उसमें प्रगतिवाद के प्रवक्ताओं की नि:संज्ञ अक्षमता गौर जड़-बधिर-अंध-पंगु प्रतिभा का भी विलक्षण योग था ।'' -इसी पुस्तक से
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