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Raja Kalasya Karanam
महाराजा दीवानखाने में विचारमग्न स्थिति में बैठे थे । महाराजा के निजी मुंशी जी नागेश पांडुरंग भिडे कुछ दस्तावेजों पर महाराजा की दस्तखत लेने हाजिर हुए । उन्होंने हल्की खाँसी की आवाज“ की । महाराजा चैंक गए । “अरे, आप ?” कहकर उन्होंने सामने देखा तो उन्हें दीवान सबनीस जी दिखाई दिए । “हम आप ही की राह देख रहे थे ।” “क्यों ?” “अन्दर चलिए, बताते हैं ।” तीनों अन्दर के कमरे में आए । “क्या बात है, हुजूर चिन्ता में डूबे हैं ?” दीवान जी ने पूछा । “बात ऐसी है दीवानजी । आप जानते हैं हमने अपने निजी मन्दिर के ब्राह्मण पुरोहित को निकालकर वहाँ मराठा पुरोहित को नियुक्त किया है––– ।” “पर हुजूर, इसे तो करीबन एक–डेढ़ महीना हुआ होगा!” “हाँ । हम आज तक राह देखते रहे कि हमारे अन्त%पुर में भी यही परिवर्तन होगा––– पर अभी तक तो ब्राह्मण पुरोहित ही पूजा–पाठ करने आता–जाता है–––” “हुजूर क्रोध न करें । पर यह सालों के पुराने, दृढ़ संस्कार हैं, इतनी कम अवधि में–––” “मुन्शी जी, आप सनातन कुप्रथा की पैरवी कर रहे हैं ?” “हुजूर गलत समझ रहे हैं, मैं कुप्रथा की पैरवी नहीं कर रहा हूँ । दृढ़ संस्कारों की बात कर रहा हूँ । क्षमा करें धृष्टता की ।” “कोई बात नहीं । हमारा विचार है कि रानीसाहिबा के पास सन्देश भिजवाकर कहें कि वे मराठा पुरोहित की नियुक्ति करें–––” दीवान जी ने कहा, “महाराजा का विचार ठीक है । पर इस मामले में जल्दबाजी अच्छी नहीं, मैं बाबासाहब खानविलकर को सन्देश भेजने की व्यवस्था करता हूँ कि वे हुजूर से मिलें । विठ्ठल इंगवले हरकारे को पॉवर हाउस के ऑफिस भेजता हूँ ।” “हाँ, कह देना, शाम को मिलना और हाँ, आप दोनों भी उपस्थित रहें तो ठीक रहेगा––– ।” “जो आज्ञा” शाम के छ% बजे थे । दीवानखाने की गपशप खत्म हुई कि बाबासाहब खानविलकर आए । वे रानीसाहिबा लक्ष्मीबाई के भाई थे । उनका अपनी बहन से रोज“ाना मिलना–जुलना था । महाराजा का विश्वास था कि वे बहन से बातचीत कर ब्राह्मण पुरोहित से पूजा–पाठ करवाने की व्यर्थता बताएँगे और रानीसाहिबा का मत–परिवर्तन करेंगे सो उन्होंने बिना कुछ प्रस्तावना से भिडेजी और दीवानजी के सामने बाबासाहब से कहा, “बाबासाहब, आपकी बात अन्त:पुर में शिरोधार्य मानी जाती है, तो हमारी इच्छा है कि आप रानीसाहिबा से कहें कि ब्राह्मण पुरोहित से भी अच्छा पूजा–पाठ मराठा पुरोहित करता है, क्यों नहीं वे मराठा पुरोहित की नियुक्ति करतीं ?” “हुजूर की इच्छा सर आँखों पर––– मैं ज“रूर उनसे कहूँगा––– ।” महाराजा निश्चिन्त हुए । सात/आठ दिन बीते । महाराजा कुछ दस्तावेज देखते दीवानखाने में बैठे थे । खानविलकर आए । “सलाम हुजूर” “आइए––– आइए––– बैठिए–––” µइसी कहानी संग्रह से
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