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Pratirodh Aur Cinema

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भूमंडलीकरण के पूर्व तक हिंदी सिनेमा में दलित, स्त्री, किन्नर, आदिवासी आदि हाशिए पर खड़े समाज को केवल पात्र बनाकर पेश किया जाता था । फिल्में केवल उनके जीवन से जुड़ी समस्या को ही उठाती थीं । उनके अंदर के प्रतिरोध को व्यापक रूप में नहीं दिखाया जाता था । मैंने जिन फिल्मों पर विचार किया है उनमें प्रतिरोध का मुखर रूप सामने आया है । फिल्में समाज का हिस्सा होते हुए भी समाज को बहुत गहराई से प्रभावित नहीं कर पातीं । सिनेमा, कला का सशक्त माध्यम होते हुए भी समाज के लिए सिर्फ मनोरंजन का साधन बन कर रह गया है । साहित्य और सिनेमा का संबंध अटूट है । साहित्य, समाज, सिनेमा में प्रतिरोध में की संस्कृति की विकास प्रक्रिया को समझने के क्रम में मैंने पाया कि प्रतिरोध एक सामूहिक प्रक्रिया है जिसमें कोई समाज, वर्ग या समुदाय अपने जीवन में आने वाले अवरोध के विरोध में खड़ा हो जाता है । सत्ता की क्रूरता जब हद से ज्यादा बढ़ जाती है तब प्रतिरोध का जन्म होता है । दलित, आदिवासी और स्त्री समाज को आरंभिक समय से दबाया गया । रोटी, कपड़ा, मकान जैसी बुनियादी चीजों से दूर किया गया । उनकी उपेक्षा की गई । उनके अधिकारों को छीन कर उनका अपमान किया गया । प्रतिरोध की संस्कृति से ही समाज का विकास संभव हुआ । मनुष्य स्वभावत: प्रतिरोधी होता है । जब–जब उसकी अस्मिता को ठेस पहुंचाई है उसने विरोध का रास्ता अपनाया है ।

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