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Pahal Aur Gyanranjan

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ज्ञानरंजन के सम्पादन में 1973 में 'पहल' का प्रकाशन शुरू हुआ था, जो लगातार सक्रियता से प्रगतिशील परम्परा को वैचारिक और रचनात्मक दोनों स्तरों पर प्रभावशाली बनाने में लगा था। पत्रिका 'इस महादेश की चेतना के वैज्ञानिक विकास के लक्ष्य और संकल्प, से प्रतिबद्ध थी। सैद्धान्तिक, वैचारिक और रचनात्मक पक्षों को लेकर महत्त्वपूर्ण संगोष्ठियों के पूरे विचार-यहस को 'पहल' (अंक 8) में प्रकाशित किया गया। उसी सम्मेलन में मार्क्सवादी सौन्दर्यशास्त्र पर 'पहल' विशेषांक की घोषणा हुई, जो आगे प्रकाशित हुई। इन तमाम प्रयत्नों से 'पहल' उपक्रम की प्रगतिशीलता और वामपन्थी विचारशीलता का आगाज सामने आया, जिसने पूरे परिदृश्य को गहरे प्रभावित किया। कहानीकार के रूप में शिखर पर आरूढ़ ज्ञानरंजन की यह दूसरी पाली थी, जिसकी शुरुआत में ही शिखर छूने का यकीन था। इस तरह 'पहल' की गम्भीर यात्रा की शुरुआत हुई। इस तरह 'पहल' एशिया महाद्वीप में वैज्ञानिक विचारों के विकास संकल्प को वरण करने वाली पत्रिका बन गई। जिसकी अन्त तक प्रगतिशील मूल्यों के प्रति दृढ़ आस्था कायम रही बिना किसी संस्थान और संसाधन के बड़े दायित्व को मूर्त करने की दुष्कर कोशिश से इस पत्रिका ने अपनी यात्रा की और तमाम तरह की प्रतिकूलताओं और अभावों के बावजूद अपनी इकलौती आस्था के बूते सक्रियता बनाये रही। नतीजतन अपनी बहुविध सक्रियता के विस्तार से इस पत्रिका ने एक सांस्कृतिक आन्दोलन को सम्भव किया। बेशक इसके सार्ववाह ज्ञानरंजन के लिए यह यात्रा लगभग तनी डोर पर चलने-सी दुष्कर जरूर रही। लेकिन जद्दोजहद की वे गाथाएं गोग हैं महत्त्वपूर्ण यह है कि उन्होंने अपनी सार्थक सक्रियता से रचनात्मक क्षितिज का ऐसा विस्तार कर लिया कि 'पहल' एक पत्रिका नहीं, आन्दोलन के रूप में इतिहास बन गयी। -कर्मेन्दु शिशिर

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