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Media : Samkaleen Sandarbh
मीडिया लोकतंत्र का सशक्त प्रहरी है । लोकतंत्र, जिन चार आधारशिलाओं पर आश्रित है, उसमें एक मीडिया भी है । जिस भी किसी राष्ट्र अथवा देश का मीडिया जितना अधिक स्वतंत्र, निष्पक्ष एवं पारदर्शी होता है , उस देश का लोकतंत्र भी उसी अनुपात में अधिक समावेशी, जवाबदेह एवं लोकतान्त्रिक होता है । इसलिए आधुनिक समाज के बदलते लोकतान्त्रिक परिदृश्यों और समकालीन संदर्भों में मीडिया की भूमिका और भी अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है । ऐसे में परिवर्तित युग बोध के साथ मीडिया को भी अपने स्वरुप को और अधिक समवेशी बनाना होता है, तभी उसकी प्रासंगिकता और उपयोगिता बची रहती है । मीडिया वंचित वर्गों के हितों और अधिकारों का भी प्रतिनिधि है । महिलाओं, दलितों, दिव्यांगों सभी के स्वर का सामूहिक प्रतिनिधित्व आधुनिक मीडिया करता है । सामाजिक–सांस्कृतिक संघर्षों को भी मीडिया ने मुखरता से अभिव्यक्त किया है । परिवर्तित परिदृश्य के साथ मीडिया का सामाजिक–सांस्कृतिक अधिकारों का प्रतिनिधि होने के इस सकरात्मक और क्रमिक परिवर्तन को भी पुस्तक ने समावेशी रूप से सारगर्भित किया है । परिवर्तन सृष्टि का स्थायी तत्व है । कहा भी जाता है, कि इस संसार में कुछ भी स्थायी नहीं है, सिवाय परिवर्तन के । ऐसे में मीडिया ने स्वयं में सकरात्मक परिवर्तन करते हुए अपने स्वरुप को बहुआयामी बनाया है । सोशल मीडिया, डिजिटल मीडिया और ओटीटी प्लेटफार्म इसी परिवर्तन का परिणाम है । मीडिया ने आधुनिक प्रौद्योगिकी को स्वीकार कर न केवल अपने भौतिक संरचना को परिवर्तित किया बल्कि आंतरिक स्वरुप को और अधिक सर्वसमावेशी और लोकतान्त्रिक बनाया है । अब समकालीन संदर्भों में मीडिया स्वयं को निष्पक्ष, पारदर्शी और स्वतंत्र बनाने में कितना अधिक सफल हो पाया है ? कितना नहीं ? पुस्तक इस पर भी दोनों पक्षो के संवाद और मतों के आग्रह को समेटे हुए है । जिम मोर्रिसन का एक कथन है कि, “जो मीडिया को नियंत्रित करता है, वह जन के मन को भी नियंत्रित करता है” । ऐसे में भूमण्डलीकरण, बाजारवाद और विज्ञापन के इस दौर में ये और भी अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है कि मीडिया के नियंत्रक भी नैतिक ईमानदार एवं सत्यनिष्ठ हो । मीडिया के भाषिक संदर्भों को भी यदि देखे तो पत्रकारिता में कार्टून और इमोजी का अभिनव प्रयोग कर सूचना को और अधिक सारांशित करना, बदलते मीडिया स्वरुप का ही प्रत्यक्ष प्रमाण है । मीडिया की भाषा भी समाज और संस्कृति के अनुरूप ही समाज के साथ परिवर्तित हुई है, ऐसे में वर्तमान संदर्भ में ‘मीडिया कि सामान्य भाषा और समाज के भाषिक संस्कार और परिष्कार के उत्तरदायित्व’ की मतभिन्नता को भी इस पुस्तक ने समहित किया है–– ऐसे में यह पुस्तक मीडिया के समकालीन संदर्भों को सम्पूर्णता में समेटते हुए परिवर्तित युग के अनुरूप मीडिया को आधुनिक बोधसंपन्न, सर्वसमावेशी, निष्पक्ष एवं तार्किक होने का आग्रह रखती है । साथ ही यह पुस्तक, मीडिया के उन आयामों और उन चरित्रों की भी विस्तृत आलोचना करती है, जो वर्तमान संदर्भों में मीडिया को विश्वसनीयता के कटघरे में रखते है । पूँजीवाद के इस युग में मीडिया सार्वजानिक और निजी क्षेत्र के मध्य कहीं अपने मूल को ही ना विस्मृत कर दे, ऐसे में मीडिया की तार्किक, निष्पक्ष, पारदर्शी चेतना को बनाये रखना ही पुस्तक का सार तत्त्व है ।
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