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Media Samay Sahitya

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वर्तमान परिदृश्य को देखकर ऐसा प्रतीत होता है कि समाज में तेजी से बढ़ रही धनी बनने की प्रवृत्ति से हर जगह बाजारवाद उफान मार रहा है । आज मीडिया बाजार में बुरी तरह समरस हो चुका है । उसको बाजार से बाहर निकाले वगैर न उसका और न ही साहित्य का भला हो सकता है । इसके लिए नवजागरण और चिंतन की पृष्ठभूमि तैयार करनी पड़ेगी, वरना जिस गति से मीडिया से साहित्य बहिष्कृत होता जा रहा है, वह दिन दूर नहीं जब मीडिया और साहित्य में कोई अंतर्संबंध ही नहीं रह जाएगा । अस्तित्व, अधिकार, अस्मिता, स्वाधीनता, स्वावलंबन, समानता, सजगता एवं आर्थिक स्वतंत्रता के प्रश्न कहीं बेमानी न हो जाएँ, इसके लिए मीडिया को जनता से सिंथेटिक रूप से नहीं वरन क्रिएटिव रूप से जुड़ना पड़ेगा । युगीन समस्याओं, आशाओं और आकांक्षाओं को चिंतन एवं मनन के रूप में पत्रकारों व साहित्यकारों से पूर्ण प्रतिबद्धता के साथ अभिव्यक्त करने की अपेक्षा की जाती है । अब समय आ गया है कि मीडिया और साहित्यकार आत्ममंथन कर भविष्यद्रष्टा ही नहीं भविष्यस्रष्टा बनकर भी मानवीय मूल्यों से युक्त प्रासंगिक लेखन कर मनुष्यता के पक्ष में खड़े हों । मीडिया, समय और साहित्य चिंतन रूपी सामाजिक सरोकार के विभिन्न आयाम हमें एक–दूसरे से संदर्भित करते रहते हैं, जिसके कारण हमारा जुड़ाव विभिन्न कृति–प्रकृति और मानवीयता के साथ बना रहता है । बिना सरोकार के मानवीय मूल्य का आधार टिक नहीं पाता । सरोकार का अर्थ बहुआयामी परिवेश में हमारा संबंध, संदर्भ और जीवन का समत्व जुड़ा रहता है । इसका मध्य चित्त के विचलन से चिंतन की चिंगारी हमारी स्मृति को, संस्कृति को जाज्वल्यमान किये रहती है । भारतीय चिंतन परंपरा में सरोकार का संबंध बहुत ही महत्त्वपूर्ण है । सरोकार का वैचारिक पक्ष चिंतन से ही प्रतिफलित होता है । मीडिया का सरोकार भी इससे विलग नहीं है ।

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