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Kathakaar Kashinath Singh
काशीनाथ सिंह प्रेमचंद की परंपरा के होकर भी उनसे अलग खड़े दिखाई पड़तें हैं । विषयवस्तु की सामाजिकता इन्हें प्रेमचंद की परंपरा से जोड़ती है, तो पात्र के प्रति आत्मीयता उनसे विशिष्ट बना देती है । कथन की सहजता उनके रचना कर्म को प्रेमचंद के करीब लाती है, तो स्थानीय भाषा का प्रयोग उनसे दूर कर देती है । इन सब से अलग वे अपनी रचना में स्थानीयता को महत्व देते हैं, जो अपनी पहचान एवं गंध को लिए पूरी विश्वसनीयता के साथ रचना में नज़र आता है, जबकि प्रेमचंद के यहाँ यह प्रवृत्ति न के बराबर है । काशीनाथ सिंह अपनी रचना में सबसे अधिक महत्व पात्रों को देते हैं । उनके अनुसार पाठक का जुड़ाव स्थितियों से नहीं पात्रों से होता है । ज्वान, जादू, सुधीर घोषाल, भोला बाबू, तन्नी गुरु, रघुनाथ आदि पात्र कथाकार द्वारा जीवन की अनगढ़ परिस्थितियों से निकाल कर सामने लाए गए हैं । रचनागत उद्देश्य एवं पात्रों की भिन्नता के कारण उनके द्वारा पात्र–चित्रण की भाषा–शैली भी भिन्न हो जाती है । वे कथाकार के रूप में भाषागत संस्कार को ठेठ जीवन से अर्जित करते हैं और उसे अपने कथा–विषय एवं किस्सागोई की प्रवृत्ति के अनुकूल बनाते हैं । जीवन के विविध प्रसंगों को व्यक्त करने के लिए काशीनाथ सिंह जिस भाषा का प्रयोग करते हैं, वह स्वयं इनके द्वारा अर्जित है । इन्होंने मानक हिंदी तथा स्थानीय बोली के सामंजस्य के साथ कहने का जो ढंग इज़ाद किया है, वह उन्हें अपने समकालीन कथाकारों से विशिष्ट बनाता है ।
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