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Kataar Mein Antim
पिता आते ही फिर यात्रा में निकल जाते थे पिता उनकी आरामकुर्सी वैसे ही अलसाई पड़ी होती थी जिस पर बैठकर वह हमेशा अपनी आंख मूंद लेते थे । पिता के जाते ही उदास हो जाती थी मां! सुंदर पृथ्वी में उनका स्वप्न हिलकोरें मारता सूरज के उगते ही वह अपने झिलमिलाते सपने ऊपर आसमान पर टांग देती थीं अभाव के इस मरुस्थल पर हमारे छोटे–छोटे पैरों के निशान थे जिनमें पिता हमारे सहयात्री नहीं थे । जब भी पिता सफर से लौटते मैं उनकी छाया से भी दूर भागता कहीं साथ जाने की बात तो दूर मैंने कभी उनसे कोई बात नहीं की बस सुनता रहता था उनका एकालाप । जूते, छाता और लाठी भी व्यक्तिवाचक संज्ञा हो गए थे जूते से याद आता पिता का जूता जिन्हें पिता ने एक क्षण भी बैठने नहीं दिया छाते से याद आता पिता का छाता जिसे तानकर वह सारी दुनिया से कट जाते थे लाठी को पिता के कमरे में मैंने बहुत कम खड़े देखा ।
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