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Kandhe Par Kyu Baitha Shap
महाकवि कालिदास के देहान्त और उसके कारकों की तलाश में साहित्य की वीथि पर दृष्टि डालें तो दूर–दूर तक अँधेरा दिखाई देता है । अमावस की रात का स्याह घुप्प अँधेरा, जैसे मौनी अमावस्या का महामौन । कालिदास के कारुणिक देहान्त को विषय बनाकर वर्षों पहले डॉ– मीरा कांत ने एक नाटक लिखा था । वह नाटक ‘श्रूयते न तु दृश्यते’ शीर्षक से ‘समकालीन भारतीय साहित्य’ में प्रकाशित हुआ था । फिर परिवर्द्धित होकर यह ‘कन्/ो पर बैठा था शाप’ के नाम से पुस्तकाकार रूप में प्रकाशित हुआ । मंचन के बाद इस नाटक ने अपार चर्चा और प्रशंसा अर्जित की । यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि एक नाटककार के रूप में डॉ– मीरा कांत की जो राष्ट्रीय प्रतिष्ठा है उसके निर्माण में इस नाटक की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है । कहते हैं कि नाटक तीन स्तरों पर अपना आकार हासिल करता हैµपहली बार जब नाटककार अपना लेखन पूरा करता है, दूसरी बार जब निर्देशक उसे मंचित करता है और तीसरी बार जब दर्शक उसे ग्रहण करता है । और तीनों ही स्तर पर एक सृजनात्मक चुनौती कायम रहती है । इसलिए निर्देशक और दर्शक की प्रतिक्रिया रंग–जगत के लिए काफी महत्त्वपूर्ण होती है । सर्वविदित है कि ‘कन्/ो पर बैठा था शाप’ की हर स्तर पर खूब प्रशंसा हुई, लेकिन इस प्रशंसा से नाटककार सन्तुष्ट होकर ठहर नहीं गयीं । उनका प्रयोग/ार्मी मन सम्भावनाओं की बाँह थामे इसके सृजन–विलय में वर्षों भटकती रही । वही सृजनात्मक बेचैनी ‘कन्/ो पर क्यों बैठा था शाप’ के रूप में सामने आयी है ।
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