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Kaamkaji Mahila
किसी परिवार, समाज या देश की ताकत उसकी अर्थसत्ता से निहित होती है । परिवार की अर्थसत्ता प्राय: पुरुषों के हाथ में होती है, स्त्रियों को उनके द्वारा दिये गये धन पर निर्भर रहता है, यह समाज का कटु सत्य है । सभी आज के दौर में कई क्षेत्रों में पुरुषों से आगे हैं, फिर क्या कारण है जो उसे पुरुषों के समकक्ष नहीं आँका जाता । निर्णय का अधिकार सिर्फ पुरुषों के हाथ में ही क्यों होता है ? फिर चाहे वह बड़ा फैसला हो या छोटा । परिवार और समाज में रहकर मैंने महसूस किया है कि घर में पुरुष के बराबर या कहीं–कहीं उससे अधिक आमदनी कमाने वाली स्त्री इस अर्थसत्ता से वंचित है, अर्थ की पावर आज भी पुरुष के पास है, वह पुरुष द्वारा कमाई गयी धनराशि हो या स्त्री के द्वारा, खर्च किस तरह करना हो, इसका निर्णय पुरुष ही करेगा । कहना न होगा कि नौकरीपेशा करने वाली स्त्रियाँ दोहरी–तिहरी जिम्मेदारी निभाने के बावजूद आर्थिक रूप से स्वतन्त्र नहीं हैं । मेरे स्वयं के सर्वेक्षण के अनुसार लगभग 90 प्रतिशत महिलाओं की आमदनी का लेखा–जोखा उनके पतियों के पास रहता है । कारण रोजमर्रा की भागदौड़ की जिन्दगी सँभाल नहीं सकतीं इसलिए उनके पति ही सारा हिसाब किताब संभालते हैं । चकित करने वाली बात यह है कि जहाँ पति बेरोजगार हैं, पत्नी की आमदनी से ही पूरा परिवार चलता है, वहाँ पर पत्नी की आय का सारा व्यय पति के हाथों, उनकी समझ के अनुसार किया जाता है ।
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