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Jo Tar Pe gujari Hai
कविता हर युग में मूलत: स्वान्त : सुखाय ही लिखी गई है, मध्य कालीन युग में दरबारी कवि होते थे, जिनका उद्देश्य काव्य लेखन में राजाaओं को प्रसन्य करने का होता था । इस लिये वह कविता सार्वभौमिकता के स्तर को नहीं प्राप्त कर पाती थी । वह सिर्फ दरबार में चकाचैंध या आश्चर्य की लहर पैदा करने के लिये होती थी, हृदय के मार्मिक स्पन्दन के लिए ऐसी कविताओं में बहुत कम जगह होती थी, लेकिन उस जमाने में ऐसे कवि हुए हैं जो अपने हृदय की पीड़ा उसकी छटपटाहट को ही अभिव्यक्ति देना सर्वश्रेष्ठ समझते थे और उनकी कवितायें काल और देश की परिधि को बड़ी ही सहजता से पार कर लेती थीं, और आज भी उनका हृदय–स्पर्शी गुण पाठक को अभिभूत कर ही देता है, ऐसे में कवियों में तुलसीदास, सूरदास और घनानंद हैं जिनका उद्देश्य किसी राजा को खुश करना नहीं होता था, उनकी कविता हृदय की अंत% प्रेरणा से अभिव्यक्त होती थी, घनानंद ने तो यहाँ तक लिख दिया किµ‘‘लोग हैं लाग कवित्त बनावत, मोहि तो मोरे कवित्त बनावत ।’’ मैंने कहा है कि यह युग कविता का नहीं है तो इसका मतलब यह नहीं कि कवितायें लिखी ही नहीं जानी चाहिये, कवितायें तो लिखी ही जायेंगी, चाहे उनको सम्मान मिले या न मिले, असल में वास्तविक कविता सार्वभौमिक सत्य के आलोक को प्रस्तुत करती है, वह किसी विशेष विधा की मोहताज नहीं होती है । वह किसी युग की मूल प्रवृतियों की अनुगामिनी नहीं होती । --इसी पुस्तक से
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