- New product
Hindi Bhasha Aur Sahitya Ka Vikas
भाषा चाहे स्वभावज हो अथवा मनुष्यकृत, ईश्वर को उसका आदि कारण मानना ही पड़ेगा, क्योंकि स्वभाव उसका विकास है और मनुष्य स्वयं उसकी कृति है । मनुष्य जिन साधनों के आधार से संसार के कार्यकलाप करने में समर्थ होता है, वे सब ईश्वरदत्त हैं, चाहे उनका सम्बन्ध बाह्य जगत् से हो अथवा अन्तर्जगत् से । जहाँ पंचभूत और समस्त दृश्यमान जगत् में उसकी सत्ता का विकास दृष्टिगत होता है, वहाँ मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार, ज्ञान, विवेक, विचार आदि अन्त: प्रवृत्तियों में भी उसकी शक्ति कार्य करती पाई जाती है । ईश्वर न तो कोई पदार्थविशेष है, न व्यक्तिविशेष, वरन् जिस सत्ता के आधार से समस्त संसार, किसी महान् यंत्र के समान परिचालित होता रहता है, उसी का नाम है ईश्वर । संसार स्वयं विकसित अवस्था में है, किसी बीज ही से इसका विकास हुआ है । इसी प्रकार मनुष्य भी किसी विकास का ही परिणाम है किन्तु उसका विकास संसार–विकास के अन्तर्गत है । कहने वाले कह सकते हैं कि मनुष्य लाखों वर्ष के विकास का फल है, अतएव वह ईश्वरकृत नहीं । किन्तु यह कथन ऐसा ही होगा, जैसा बहुवर्ष–व्यापी विकास के परिणाम किसी पीपल के प्रकाण्ड वृक्ष को देखकर कोई यह कहे कि इसका सम्बन्ध किसी अनन्तकाल व्यापी बीज से नहीं हो सकता । भाषा चिरकालिक विकास का फल हो और उसके इस विकास का हेतु मानव–समाज ही हो किन्तु जिन योग्यताओं और शक्तियों के आधार से वह भाषा को विकसित करने में समर्थ हुआ, वे ईश्वरदत्त हैं, अतएव भाषा भी ईश्वरकृत है, वैसे ही जैसे संसार के अन्य बहुविकसित पदार्थ ।
You might also like
-
'Amola' Ki Kisuli
Rs 295 Rs 221.25 25% OFF -
'Kitne Shahro Mein Kitni Baar' Mein Chitrit Parivesh
Rs 275 Rs 206.25 25% OFF -
Aadhunik Awadhi Kavya Prakriti Chitran
Rs 395 Rs 296.25 25% OFF -
Aadhunik Ram Kavya Ki Parampara
Rs 525 Rs 393.75 25% OFF -
Aadhunik Urdu Gazal
Rs 525 Rs 393.75 25% OFF