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Hali Aur Hayat-e-Sadie

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ख्वाजा अलताफ हुसैन हाली की 19वीं सदी के महान लेखकों और शायरों में अपनी एक अलग पहचान और अलग शैली है । उनका जन्म 1837 ई. में पानीपत में हुआ । वह उर्दू साहित्य के पहले रीफार्मर और एक महान परोपकारी हैं जिन्होंने साहित्यिक और सामाजिक स्तर पर जीवन के बदलते तकाजों को महसूस किया और साहित्य और समाज को इन आवश्यकताओं के अनुरूप ढालने में ऐतिहासिक भूमिका निभाई । उनकी तीन अहम किताबें हयाते सादी, यादगारे गालिब और हयाते जावेद जीवनियां भी हैं और आलोचना भी । उन्होंने मुकद्दमा शेर ओ शायरी के द्वारा उर्दू में नियमित आलोचना की नींव रखी और शायरी के संबंध में एक संपूर्ण और जीवनदायी सिद्धांत तैयार किया और फिर उसकी रौशनी में कविता पर टिप्पणी की । उर्दू आलोचना के जो सांचे हैं, वह हाली के बनाए हुए हैं और अब जिन चीजों पर जोर दिया जाता है, उनकी ओर सबसे पहले हाली ने ध्यान आकर्षित किया । हाली ने औरतों की उन्नति और उनके अधिकारों के लिए बहुत कुछ लिखा । उर्दू साहित्य में हाली का दर्जा कई मायनों में विशिष्ट और अद्वितीय है । जिस समय उन्होंने साहित्य के क्षेत्र में प्रवेश किया, उस समय उर्दू शायरी शब्दों का खेल थी, या प्रेम कविता में प्रेम–प्रसंग के विषय लोकप्रिय थे । ग़ज़ल में सार्वभौमिकता और सामूहिकता का जिक्र बहुत कम था और शायरी एक निजी शौक बनकर रह गई । हाली ने इन प्रवृत्तियों की अपेक्षा वास्तविक एवं सच्ची भावनाओं की स्पष्ट अभिव्यक्ति को प्राथमिकता दी । वह आधुनिक कविता के पहले वास्तुकारों में से एक थे । उन्होंने ग़ज़ल को वास्तविकता से जोड़ा और राष्ट्रीय और सामूहिक कविता की नींव रखी । इसी प्रकार उन्होंने गद्य में सरलता और स्पष्टता का परिचय दिया और उसे शैक्षणिक, साहित्यिक और शोध संबंधी सभी प्रकार के विषयों के निष्पादन में सक्षम बनाया । हाली शराफत और सदाचार के प्रतीक थे । सहनशीलता और उच्च विचारशीलता उनके गुण थे जो उनके लेखों में देखे जा सकते हैं । उर्दू साहित्य की जो विशाल, सुंदर और मनोरम इमारत आज दिखाई देती है उसकी आधारशिला हाली ने रखी थी ।

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