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Ekta

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बैठे–बिठाये एक दिन ऐसी बात उपजी कि अपने लेखों का एक ऐसा संग्रह कीजिये जो अपना ही नहीं, अपने समाज, साहित्य तथा इतिहास का भी प्रतिबिम्ब हो और हो उसमें व्यक्तिगत जीवन के साथ ही कुछ शब्दशक्ति अथवा शब्दब्रह्म की गाथा भी । अपने छोटे लेखों की छटनी हुई तो बहुत से काम के निकल आये और जो छपे हुए दृष्टिपथ में न आये वे अलग से लिख लिये गये, और इस प्रकार इस एकता का सम्पादन हो गया । इसमें जानकारी की अनेक बातें हैं जो सजग दृष्टि से इसका अध्ययन करेगा उसको प्राप्त भी थोड़ा न होगा । किन्तु जो उड़ती दृष्टि से इसे देखेगा उसे भी कुछ अवश्य हाथ लगेगा । इसके पाठक के पल्ले कुछ पड़े, यही इसका लक्ष्य रहा है, और उद्देश्य यह कि इसके द्वारा स्थिति की विषमता को समझने तथा उसको दूर करने में भरपूर मदद मिले । आज की परिस्थिति पहले से कुछ भिन्न है पर स्थिति फिर भी वही है । आशा है इसके अनुशीलन से अनेक तथ्यों का पता चलेगा और पाठक कुछ सोच–समझ कर ही किसी प्रवाद अथवा प्रचलित धारणा के विषय में कुछ बोलने का कष्ट करेगा । इसलाम के आने से इस देश में क्या हुआ तथा उसके जन्म से पहले इस देश की स्थिति क्या थी, इसका भी आभास यहाँ मिल जायेगा ।

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