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Ek Aur Duniya Hoti
‘–––एक बार उसने हँसकर कहा था मुझसेµ‘मुझे जानना क्या इतना आसान है, कुछ मेरे साथ रहो, घूमो–पिफरो, दुनिया देखो, तब आप ही जानने लगोगे । और तभी मैंने इस धारा में अपनी डोंगी उतारी थी । छोटी–सी । अमृत को जानने के लिए विष चखकर देखा । मन तभी से मतवाला है । कुछ रुचता नहीं । जैसे कुछ चले जाने का संताप दग्ध करता रहता है । जी में आता है कि सब उल्टी–पुल्टी चीजें ठीक कर दूँ, लेकिन कैसे ? कैसे ? जाना कहीं है, चला कहीं जा रहा हूँ । यह दुनिया कुछ और ही साँचे में ढलती जा रही है । ’’
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