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Director Cut : Hindi Cinema Ke Shuruati Daur Ke Aala Flimkar

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बोलती फिल्मों का दौर आने तक फिल्म अभिनय को एक सम्मानजनक पेशा नहीं समझा जाता था, इसलिये नारी पात्रों के लिये लड़कियाँ नहीं मिल पाती थीं और नौजवान लड़कों को ही जनाना मेकअप करके काम चला लिया जाता था । धीरे-धीरे इन पात्रों के लिये नाच-गाने के पेशे वाली लड़कियों को लिया जाने लगा । उन दिनों यह समस्या भी पेश आती थी कि जिस अभिनेता की शक्ल अच्छी होती और एक्टिंग में माहिर होता, जरूरी नहीं कि उसकी आवाज़ भी सुरीली या रौबदार हो । इसके अलावा संगीतकारों और उनके साजिन्दों को शूटिंग की जगह मौजूद रहकर साज बजाने होते थे जिससे फिल्म बनाने में कठिनाई पेश आती थी । इस समस्या का हल 1935 में प्ले बैक की तकनीक के आविष्कार से निकल गया । प्ले बैक का सिस्टम चालू होते ही फि'ल्मों में संगीत का एक तूफ'ान-सा आ गया और फि'ल्मों को उनकी कहानी, अभिनय या निर्देशन से ज्यादा उनके संगीत के सन्दर्भ से पहचाना जाने लगा । नये-नये सुरीले गानेवाले मैदान में आए । उन गायक कलाकारों के प्रशंसकों की टोलियाँ बनीं जो कि अपने प्रिय गायक के 78 आर-पी-एम- के ग्रामोफ'ोन रिकार्ड हाथों-हाथ ख़रीदते और सैकड़ों की तादाद में जमा करते थे । सिनेमा हॉल में जब उनका प्रिय कलाकार पर्दे पर गाना गाता तो दर्शक मन्त्रमुग्ध होकर हवा में सिक्के और नोट उछालते और नाचने लगते थे । उस ज़माने में तमाम कलाकार और टेक्नीशियन फि'ल्म निर्माता के तनख्'वाहदार कर्मचारी होते थे और उनकी सेवाएँ फि'ल्म निर्माण के लिये हर समय उपलब्ध रहती थीं । इसे स्टूडियो सिस्टम कहा जाता था और इसमें फि'ल्म कम समय में बनकर तैयार हो जाती थी ।

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