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Cinema Aur Samaj
हमारा भारतीय सिनेमा शुरू से ही कुछ मूल्यों का पुरस्कार करता आया है । पहला भारतीय सिनेमा सत्यवचनवादी हरिश्चंद्र और तारामती के जीवन की कथा पर आधारित था । सत्य, अहिंसा, प्यार, मानवता, सहिष्णुता, अच्छाई की जीत, बंधुभाव जैसे सदियों से चले आ रहे मूल्यों का पुरस्कार भारतीय सिनेमा ने किया है । आप अगर बारिकी से भारतीय सिनेमा ही नहीं, बल्कि विश्व सिनेमा का भी अध्ययन करें तो सहजता से जान पाएंगे कि सिनेमा चाहे जैसा भी हो, अंतिमत% विजय अच्छाई की और सच्चाई की ही होती है । सिनेमा कितना भी मनोरंजक हो या कई बार अवास्तविक भी हो, उस में समाज का दर्शन होता ही है । समाज को साहित्य से जिस प्रकार हम अलग नहीं कर सकते, उसी प्रकार हम, सिनेमा को समाज से अलग नहीं कर सकते । व्ही– शांताराम जी भारतीय सिनेमा के अध्वर्यु माने जाते हैं । उन्होंने ‘दो आँखे बारह हाथ’ जैसे सिनेमा का निर्माण किया था । अपराधी जितना भी बुरा हो लेकिन अगर उसकी अंतरात्मा में बसे ईश्वर को प्यार से जगा दिया जाए तो उस में परिवर्तन होना संभव है, इस सूत्र के आधार पर इस सिनेमा का निर्माण हुआ था । ‘दो बीघा जमीन’ जैसा सिनेमा किसानों की समस्याओं को सामने रखता है । ‘मदर इंडिया’ में भी किसानों के प्रश्नों के साथ–साथ मानवी मूल्यों की श्रेष्ठता अधोरेखित करने का प्रयास दिखाई देता है । मनमोहन देसाई जी तो मनोरंजन के बादशाह माने जाते हैं । लेकिन उन्होंनें भी अपने सिनेमा में ‘लार्जर दैन लाईफ’ भूमिका की स्वीकृति कर के अमीर–गरीब समस्या, बेरोजगारी, भूख, स्मगलिंग जैसे प्रश्नों पर चिंतन कर के यह बात साबित कर दी थी कि अंतिम विजय सत्य की ही होती है । सर्वश्रेष्ठ शोमन राज कपूर की ‘श्री 420’, ‘आवारा’, ‘जागते रहो’, ‘अनाड़ी’ जैसे सिनेमा में समाज का प्रतिबिंब दिखता है । -नितीन चंद्रकांत देसाई
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