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Cinema Aur Sahitya

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जब भारतीय साहित्य विश्व पटल पर प्रतिष्ठा प्राप्त कर रहा था, तब सिनेमा देश में अपने लिए जमीन तलाशने की कोशिश मैं लगा था । लेकिन आज उक्त दोनों घटनाओं को सौ वर्ष से अधिक वर्षों का समय बीत जाने के बाद यह स्थिति बनी है कि भारतीय सिनेमा, विशेषकर हिंदी सिनेमा, जहां अपना वैश्विक विस्तार कर चुका है, वहीं साहित्य में बहुत कुछ घटनाएं हुई है । दोनों के सामने नये आवाहन और चुनौतियाँ आकर खड़ी हुई हैं, लेकिन अपनी अंतर्गत सामथ्यों से साहित्य और सिनेमा ने अपनी गरिमा बरकरार रखी है । पिछले एक सौ दस वर्षों में सिनेमा ने जहाँ दर्शकों की अभिरुचि को पकड़ते हुए समय के साथ खुद को विषयवस्तु से लेकर प्रस्तुति–विधान तक निरंतर अद्यतन (अपडेट) किया, वहीं साहित्य ने खुद को नये युग में ढालकर नये नये विषयों को लिखने के नये नये प्रयोगों को अपनाया । -मनोज जोशी

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