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Bhukh, Bhukh Aur Bhukh
रतन वर्मा हिन्दी के लब्ध प्रतिष्ठित कथाकार हैं । इन्होंने विपुल संख्या में कहानियां और उपन्यास लिखे हैं । इस क्रम में उन्होंने चार लघु उपन्यास लिख हैं-अंतत:, हरिश्चन्द्र का पुनर्जन्म, सस्ती गली और गुलबिया । प्रस्तुत संग्रह का नामकरण उन्होंने ‘भूख, भूख और भूख’ रखा है । इन चारों लघु उपन्यासों में भूख की केन्द्रीयता होते हुए भी इनके पात्र परिवेश, कथा–वस्तु एवं कथा–शिल्प की भिन्नता है । फिर भी भिन्नता में अभिन्नता यह है कि ये उपन्यास अपनी लघु काया में नारी के मनोविज्ञान को बेहद सहज रूप में प्रकट करते हैं और आदमी की आदिय भूख को उजागर करते हैं, जिसे रेणु ने ‘न मिटने वाली भूख’ कहा है । ‘अंतत: उपन्यास में शरद अपनी पत्नी नीलिमा की यौन–उदासीनता से खिन्न रहता है और धीरे–धीरे योगिता के आकर्षण में बांधता जाता है । जब इस तथ्य का पता नीलिमा को लगता है तब उसमें अद्भुत परिवर्तन आता है और वह अपने दाम्पत्य को अंतत: स्थापित करने में सफल होती है । ‘हरिश्चन्द्र का पुनर्जन्म’ एक पौराणिक मिथक को प्रहसन में बदल कर प्रस्तुत किया गया एक आख्यानपरक उपन्यास है । इसमें कथानक एवं संवाद में नाटकीयता का योग एक बेहद दिलचस्प और मनोरंजक उपन्यास की श्रेणी में इसे ला खड़ा करता है । ‘सस्ती गली’ दरअसल देह–व्यापार करने वाली वेश्याओं का एक मुहल्ला है, जिसमें रहने वाली सलमा और चमेली नामक दो युवतियों को केन्द्र में रखकर इस औपन्यासिक कृति की संरचना की गई है । ‘गुलबिया’ भी नारी–प्रधान उपन्यास है, जहां नारी का चरित्र एक नए ही आयाम में प्रस्तुत हुआ है । यह पुरस्कार प्राप्त लम्बी कहानी के रूप में पहली बार प्रकाशित हुई थी । इस औपन्यासिक कृति ने रतन वर्मा को कथाकार के रूप में पहली बार स्थापित किया ।
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