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Bharat Ka Aadiwasi Swar

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आज के आदिवासी की अस्मिता ही जल, जंगल और जमीन से आबद्ध है । उनकी संपूर्ण सामाजिक संरचना और जीवनयापन का साधन जल, जंगल और जमीन ही है । जीवन के इन्हीं तत्वों के साथ आदिवासी समुदायों की भाषा, शिक्षा, संस्कृति और जीवनशैली विकसित हुई है, जो शहरी या मैदानी पहचान से एकदम पृथक है । आदिवासी साहित्य एक विशेष प्रकार का लोक–साहित्य है, जिसके केंद्र में होते हैं एक साथ रहने वाले समुदायों के सामूहिक जीवन–अनुभव । आदिवासी साहित्य की कसौटी प्रचलित सौंदर्यशास्त्र के आधार पर तय नहीं की जा सकती चूंकि वह लोक और लोक साहित्य पर आधारित होता है, जिसके लेखक अनाम और अज्ञात होते हैं । आदिवासी साहित्य लोक–साहित्य ही है, जिसके केंद्र में समूह का अनुभव होता है । उसका समकालीन साहित्य भी समूह के प्रति हो रहे अन्याय, समूह में पनपती बदलाव की इच्छा, संकल्प और समूह के प्रति बढ़ती जा रही उपेक्षा तथा समूह में बढ़ते आक्रोश व बेबसी की अभिव्यक्ति ही होता है । इसलिए आदिवासी साहित्य की कसौटी जो भी होगी वह उसके भीतर से ही उपजेगी । उस सृजित साहित्य की भंगिमा, तेवर और गंध के आधार पर ही उस साहित्य का मूल्यांकन होगा ।

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