• New product

Bangal Ke Baul

Select Book Type

In stock

ईश्वर तक पहुँचने के अनेक मार्ग वेदों, शास्त्रों, व धर्मों में पुरातन काल से बताए जा रहे हैं। उनमें से प्रमुख हैंµकर्म, ज्ञान व पे्रम। कर्म का पथ वाह्य है, ज्ञान का पथ कर्म की अपेक्षा अधिक अंतरंग है तथा पे्रम का पथ स्वाभाविक रूप से सर्वाधिक अंतरंग व श्रेष्ठतम है। मध्ययुगीन भारतीय सन्तों ने भी ईश्वर की प्राप्ति के लिए पे्रम मार्ग का ही चयन किया था। इन मध्ययुगीन सन्तों के समकालीन ही बंगाल का एक समन्वयवादी सम्प्रदाय ‘बाउल’ है। ‘बाउल’ का अर्थ ‘वायु से पूर्ण’ अर्थात् पागल है। बाउल शास्त्राज्ञान के भार से मुक्त है, साथ ही वे वाह्य जगत् में ईश्वर की खोज नहीं करते वरन् उनके अनुसार मानव शरीर में ही ईश्वर का निवास व ब्रह्माण्ड है। अतः हमें अपने अन्तर को अकलुष व पवित्रा बनाना चाहिए, ताकि हम अन्र्तनिहित ईश्वर तक पहुँच सकें। इस प्रकार बाउलों में ‘कायावाद’ ही मूल योग साधना है। पे्रम का यह सहज व सरल ईश्वर-प्राप्ति का मार्ग उतना ही प्राचीन है, जितनी कि यह मानवता। जब हम पे्रम मार्ग पर चलकर अपने अन्तःकरण में ईश्वर को पा लेते हैं, तब किसी यज्ञ, पूजा, जप, कर्मकाण्ड, रोजा या नमाज की आवश्यकता नहीं रह जाती। इस प्रकार इस बाउल सम्प्रदाय की मूल्यवान रचनाएँ हमें जाति, धर्म, आदि की तुच्छ वे मिथ्या प्राचीरों से मुक्त करती हैं। आज के इस भ्रमित वातावरण में जहाँ अनेक साधु, सन्तों, फकीरों व धार्मिक रचनाओं की भूलभुलैया में मानवता फँसी हुई है, ‘बंगाल के बाउल’ पूर्णतः प्रासंगिक व मानव जाति को एक सहज व कल्याणकारी मार्ग दिखाने वाली रचना है।

You might also like