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Aaranyak

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बिभूतिभूषण बंद्योपाध्याय सिर्फ अपने प्रकृति चित्रण के लिए नहीं, बल्कि प्रकृति को केन्द्र में रखकर लिखने वाले लेखक के रूप में भी बांग्ला साहित्य में सुपरिचित हैं । और इस मामले में ‘आरण्यक’ उनकी श्रेष्ठतम औपन्यासिक कृतियों में से एक है, जिसमें प्रकृति भी है और मनुष्य भी । आज से लगभग सौ वर्ष पहले बिहार के एक फॉरेस्ट एस्टेट में प्राकृतिक सौन्दर्य के बीच रहते हुए लेखक ने वहां के लोगों, उनकी गरीबी और सरलता का जैसा वर्णन किया है, वह न सिर्फ बेहद महत्वपूर्ण है, बल्कि उसका दस्तावेजी महत्व भी है । ‘आरण्यक’ की पृष्ठभूमि वर्ष 1924–1930 की है और इससे गुजरते हुए सहसा संजीव चन्द्र चट्टोपाध्याय के (जो बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय के बड़े भाई थे) ऐतिहासिक यात्रा वृत्तान्त ‘पालामौ’ (पलामू) की याद आती है । प्रकृति के अनवरत दोहन के कारण आज जब हम जलवायु परिवर्तन की भीषणता का निरन्तर सामना कर रहे हैं, तब ‘आरण्यक’ जैसे उपन्यास का महत्व निस्संदेह बढ़ जाता है ।

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